रायगढ़ प्रेस क्लब भवन की आधारशीला आज रखी जानी है और इसको लेकर पत्रकार जगत के लोग उत्साहित है। साथ ही साथ राजनीतिक दलों से जुड़े कुछ लोग इसे उपलब्धी बताते हुए पत्रकारों को बधाई भी दे रहे हैं, लेकिन एक युग के संघर्ष के बाद जिले के पत्रकारों को उनका भवन मिलने का सपना साकार जरूर हुआ है पर इसमें भी अभी देरी है, चूंकि नीव रखने के बाद कई साल भवन बनने में लगेंगे और इसमें भी गुणवत्ता के साथ-साथ कई चीज ऐसी है जिसके लिये पत्रकारों ने पहले से ही सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से गुहार लगाई थी। हालांकि रायगढ़ से चुनाव जीतने के बाद ओपी चौधरी ने पत्रकारों की इस मांग को जायज मानते हुए इस लड़ाई में छोटी सी जीत का योगदान दिया। साथ ही साथ प्रेस क्लब के नये अध्यक्ष हेमंत थवाईत व उनकी टीम ने भी कोशिश जारी रखी, जो उनके पुराने साथियों ने शुरू की थी।
कई साथी चले गए कुछ बाकी इंतजार में है
इस बात को लिखने से मुझे कोई गुरेज नही है कि प्रेस क्लब भवन के लिये हमारे कई दिग्गज पत्रकार आज इस दुनिया में नही है जिनमें हमारे पुरोधा बारेननाथ बनर्जी, गुरूदेव कश्यप जी, अनुपम दास गुप्ता, सत्यनारायण अग्रवाल, दयाकिशन अग्रवाल, महेन्द्र जैन, वासुदेव मोदी, प्रवीण जयसिंह सहित कई युवा साथियों को खो दिया है, जिन्होंने इस संघर्ष के लिये हजारों बार मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक को ज्ञापनों के जरिये उनके सपने को साकार करने की गुहार लगाई थी, लेकिन पुरा युग बीत गया केवल कागजों में ही यह मांग जिंदा रही और हकीकत में पत्रकारों ने भी आस छोड़ी दी थी। इतना ही नही कई बार सत्ता बदली, लेकिन सत्ता में बदले लोगों ने जिले के पत्रकारों को केवल ऐसा झुनझुना थमा दिया था जो बजता तो था लेकिन उसकी आवाज किसी को सुनाई नही देती थी। इतना ही नही कई बार तो पत्रकारों ने आंदोलन भी किये लेकिन जिले के व प्रदेश के जनप्रतिनिधि हमेशा की तरह सोते रहे और उन्हें इस मांग को लेकर वो गंभीरता नही दिखाई जो दिखाई जानी थी।
सबको मिला लेकिन यहां भी नीव रखी जा रही है
इस बात को लेकर यह आश्चर्य होता है कि प्रेस क्लब का भवन छत्तीसगढ़ के हर जिले में बनाने के लिये राजनीतिक दलों के लोगों ने बकायदा पत्रकारों को सहयोग दिया और केवल भवन ही नही बल्कि उनके आवास के लिये भी बकायदा जमीन भी आबंटित की गई। इतना ही नही रायगढ़ जिले के पुसौर तक में प्रेस क्लब भवन है लेकिन जिला मुख्यालय में आज तक नही है। इसका कारण यह है कि जिले के पत्रकारों को राजनीतिक दल केवल उनकी लडाई को और उकसाने में लगे रहते थे और जहां यह मुद्दा सामने आता था तो आश्वासन देकर इसे उस रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाता था जहां उसकी सुनवाई तो दूर बल्कि दोबारा उस कागज को कोई छूता तक नही था। अब जिले के युवा पत्रकारों के लिये यह एक सपना है और लंबे समय से इस लडाई में शामिल कुछ पत्रकारों के लिये यह केवल एक छोटा सा प्रयास है कि भवन बनेगा जरूर लेकिन इसके बनते-बनते और कितने लोग इसे देख पायेंगे।
संघर्ष अगर सही होता तो इतनी देरी नही होती
मुझे इस बात को लिखने में कोई गुरेज नही है कि रायगढ़ जिले के पत्रकारों को पूरे छत्तीसगढ़ के राजनीतिक दल सबसे अलग इसलिये समझते है, कि इस जिले के पत्रकार आपस में लडते झगड़ते एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने के अलावा कब किसको निपटा दें के कारनामों के साथ-साथ संघर्ष की लडाई में केवल मजा लेने के लिये पत्रकार बनते हैं उनके लिये यह बात जरूरी है कि अगर पत्रकारिता में दमखम होता तो आज रायगढ़ जिले के पत्रकारों को प्रेस क्लब भवन मिलने में इतनी देरी नही होती। सीख अभी भी ले लेनी चाहिए ताकि खुद के भवन के अलावा आवास की तमन्ना अभी भी अधूरी है और उसके लिये और कितने लोग इंतजार में उपर जायेंगे और कितना संघर्ष करेंगे यह तो वक्त बतायेगा।
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