पिछले कुछ वक्त में देश और दुनिया ने कई साइक्लोन का सामना किया है। इसी साल ताउ-ते और यास ने भारत में खासा नुकसान पहुंचाया। अब केंद्रीय विज्ञान और तकनीकी मंत्रालय ने इसके पीछे की वजह बताई है। गुरुवार को जारी एक वक्तव्य में मंत्रालय ने भारतीय वैज्ञानिकों के हालिया शोध का हवाला देते हुए इसके कारणों का खुलासा किया है। इसके मुताबिक पिछले चार दशक में उत्तरी हिंद महासागर क्षेत्र में खतरनाक साइक्लोन का असर ज्यादा बढ़ा है। वहीं वैज्ञानिकों ने इसके पीछे ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन को वजह बताया है।
ग्लोबल वॉर्मिंग भी बड़ी वजह
वैज्ञानिकों का कहना है कि साइक्लोन के चलते तटीय क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के लिए बड़ा खतरा पैदा हुआ है। इसके मुताबिक वातावरण को प्रभावित करने वाले तमाम तत्व, जैसे तीव्र ह्यूमिडिटी और समुद्र की सतह की गर्मी इसके पीछे की कुछ मुख्य वजहें हैं। वहीं वैज्ञानिकों ने साइक्लोन के बढ़ते ट्रेंड के पीछे ग्लोबल वॉर्मिंग को एक बड़ी वजह बताया है। आईआईटी खड़गपुर के ओशियन इंजीनियरिंग और नेवल आर्किटेक्चर विभाग के वैज्ञानिकों, जिया अल्बर्ट, अथिरा कृष्णन और प्रसाद के भास्करन ने वीआईआईटी यूनिवर्सिटी वेल्लोर के सेंटर फॉर डिजास्टर मिटिगेशन एंड मैनेजमेंट के केएस सिंह ने इस पर संयुक्त रूप से काम किया। यह स्टडी केंद्र सरकार के विज्ञान और तकनीकी विभाग के क्लाइमेट चेंज प्रोग्राम के तहत किया गया है।
ऐसे की गई स्टडी
इन वैज्ञानिकों ने कई तरह से स्टडी की। इसके तहत इन्होंने क्रिटिकल एटमॉस्फेरिक पैरामीटर्स की भूमिका और प्रभाव का अध्ययन किया। साथ ही यह भी देखा गया कि अल-नीनो दक्षिणी कंपन का उत्तरी हिंद महासागर क्षेत्र पर क्या असर पड़ता है। शोध में सामने आया कि ट्रॉपिकल साइक्लोन और इनके बीच गहरा संबंध है। इसे पॉवर डिसिपेशन इंडेक्स का नाम दिया गया। इस शोध को ‘क्लाइमेट डायनेमिक्स’नाम के जॉर्नल में प्रकाशित किया गया है। इसके मुताबिक प्री-मॉनसून के दौरान साइक्लोन आने की घटनाओं में इजाफा हुआ है। साल 2000 के बाद बंगाल की खाड़ी और अरब सागर दोनों में ही, इसका असर देखने को मिला है।
