अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट बनोरा के संस्थापक बाबा प्रियदर्शी राम ने कहा कि सन 1937 को आज के ही दिन इस धरा धाम पर अघोरेश्वर का अवतरण हुआ था l ऐसे अवतारी महापुरुषों का आगमन मानव जाति के लिये बहुमूल्य भेंट होता है l जन्मसिद्ध महापुरुष अघोरेश्वर ने 8 वर्ष की अल्पायु में गृह का परित्याग कर दिया l बाल्यकाल में साधना के दौरान आपने अनेक लोगो की समस्याओं का समाधान किया l समस्याओ के त्वरित समाधान को चमत्कार की संज्ञा मिलने लगी और बड़तीं भीड़ से अघोरेश्वर की साधना प्रभावित होने लगी l इसलिए घर का परित्याग कर काशी की ओर गए वहां अन्नपूर्णा देवी ने मार्गदर्शन देते हुए गंगा स्नान के पश्चात विश्वनाथ जी का दर्शन कराया और कीनाराम स्थल जाकर दिक्षा लेने कहा l कीनाराम स्थल के तात्कालिक महंत राजेश्वर राम जी से भी उंन्होने दीक्षा ग्रहण की l राजेश्वर राम जी भी अघोरेश्वर की सिद्धियां देख चकित हुए l अपनी सिद्धियो व ज्ञान का लाभ वे आने वाली पीढ़ी को देना चाहते थे l उंसके बाद कठोर साधना हेतु विंध्य की पहाड़ियों का चयन किया l जो भी उनसे मिलता उसका कल्याण हो जाता था और जो कुछ भी उनके श्री मुख से निकलता वह घटित हो जाता l अघोरेश्वर ने भूले भटके दुखी प्राणियों को ऐसा मार्ग दिखाने का संकल्प लिया जिस पर चलते हुए जीवन व्यतीत कर परम सुख शांति हासिल की जा सके l वे समाज को सेवाओ का लाभ देना चाहते थे l ऐसे कृष्ठ रोगी जिन्हें समाज अभिशाप मानकर रोगियों को घर से बहिष्कृत करता था ऐसे रोगियों को अघोरेश्वर ने गले लगाकर इलाज हेतु ऐसी जड़ी बूटियों का निर्माण किया गया जिससे कृष्ठ रोग का इलाज सम्भव हो सका l 1961 में कृष्ठ रोगियो के इलाज हेतु आश्रम की स्थापना की और छूत समझे जाने वाले रोगियो को सम्मान से जीने का हक दिलाया l कृष्ठ रोगियो का अपने हाथों से इलाज कर सेवा यात्रा की शुरुवात करने वाले अघोरेश्वर ने बिना तिलक दहेज के विवाह विधवा विवाह शादियों की फिजूलखर्ची पर रोक हेतु जन जागृति अंत्येष्टि की फिजूलखर्ची पर रोक सहित सामाजिक कुरूतियो पर रोक लगाने हेतु सतत प्रयत्नशील रहे l अघोरेश्वर अर्जित धन का व्यय शिक्षा संस्कार व गरीब कन्या के विवाह हेतु खर्च करने के पक्षधर रहे l महिलाओ को जागृत करने हेतु महिला मंडल युवाओ हेतु युवा मंडल की स्थापना की l उनके सद्कार्यों का दायरा विस्तृत हो चला l सभी ईश्वर की संतान है यह बताने जाति पाति ऊंच नीच के खिलाफ भी अभियान शुरू किया l हम सभी परम पिता की संतान है l मनुष्य के रूप में पैदा होने के बाद जाति धर्म का बंधन इस तरह से जकड़ लेता है कि मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देध्य भूल जाता है l मनुष्य बनने की प्रेरणा को अघोरेश्वर ने अधिक आवश्यक बताया l अघोरेश्वर ने समाज को बताया कि मानव जीवन मे साधु के साथ सैनिक के आचरण की झलक भी दिखाई पड़े l साधु व सैनिक दोनो के गुणों का जीवन में समावेश आवश्यक है l बाबा प्रियदर्शी राम ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि पश्चिमी सभ्यता के प्रचार प्रसार की वजह से समाज मे अश्लीलता का जहर फैल रहा है l मोबाईल की लत नशे की लत की तरह घातक है जैसे नशा शरीर को खोखला कर अशक्त बनाती है उसकी तरह मोबाइल का अधिक उपयोग बच्चो के दिमाग को खोखला बनाकर सोचने समझने की शक्ति को क्षीण कर रहा है l दुश्मन अब देश के अंदर मौजूद है और हर माता पिता को इस लड़ाई में शामिल होना पड़ेगा l मोबाइल के अधिक उपयोग से बौद्धिक व मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है l उन्नत राष्ट्र के लिए युवाओ का सबल होना जरूरी है l बाबा प्रियदर्शी राम ने सभी धर्म बन्धुओ सहित अभिभावको से आग्रह करते हुए कहा कि अघोरेश्वर के विचारो को प्रसारित करते हुए सभी को उनकी विचारधारा से अवगत कराएं l शिक्षा के साथ साथ संस्कार को आवश्यक बताते हुए कहा कि शिक्षा से अंधविश्वास दूर होता है आगे बढ़ने की प्रेरणा व उत्साह मिलता है l शिक्षा से मानव को आत्मनिर्भर बनने की क्षमता हासिल होती है l लेकिन संस्कार न हो तो शिक्षा अधूरी है l शिक्षा से मस्तिष्क का विकास होता है और संस्कार से हृदय का विकास होता है l हृदय के विकास से भाव को प्रधानता मिलती है l शिक्षा के साथ संस्कार को विशेष महत्व देना है l ताकि भारत की संस्कृति व संस्कार से आने वाली पीढ़ी को अवगत कराया जा सके l मौजूदा शिक्षा पद्दति पर चिंता जाहिर करते हुए बाबा प्रियदर्शी में कहा कि हमे आक्रांताओं का इतिहास पढ़ाया गया उनके जन्म आक्रमण की अनावश्यक जानकारी दी गई इसकी बजाय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े शहीदों के जीवन से अवगत कराया जाना चाहिए ताकि बच्चे उनके जीवन से प्रेरणा ले सके l माता पिता गुरु के ऋण के साथ साथ राष्ट्र का ऋण भी चुकाना आवश्यक बताया l युवा पीढ़ी को संस्कार वान बनाने की दिशा में अघोरेश्वर सतत प्रयत्नशील रहे l समाज मे सक्रिय विघटन कारी ताकतों के सक्रिय होने पर चिंता जाहिर करते हुए बाबा प्रियदर्शी राम जी ने कहा हम सभी को मिलजुल कर इसे पराजित करना है l प्रतिमा की स्थापना का वास्तिवक उद्देश्य परिभाषित करते हुए कहा कि जिनकी मूर्ति है हृदय में उनके विचारों की स्थापना ही प्रतिमा की स्थापना है l हर मनुष्य महापुरुष द्वारा बताए गए मार्ग का अनुशरण करते हुए उनके विचारों को अपने अंतःकरण में स्थापित करे l हृदय में स्थापित प्रतिमा के विचारो को व्यवहारिक जीवन मे जब बार बार उपयोग में लाया जाए तो यह मानसिक साधना बन जाती है l और मनुष्य लोभ मोह अहंकार जैसी विकृतियों से दूर हो जाता है l प्रेम प्यार शालीनता के उदय से हमारा जीवन देव विचारधारा के अनुकूल बनने लगता है l महापुरुषों के जीवन के अनुरूप अपना जीवन बनाना हमारे हाथों में है l कोई दूसरा हमारा जीवन नही बना सकता l अपने स्वभाव व आदतों को बदलने वाला मनुष्य अधोगति को प्राप्त नही होता l मानव से महामानव बनकर देवता तक बन सकता है l मन विचार परिवर्तित करने हेतु सत्संग में जाने की सलाह देते हुए कहा कि सत्संग से संस्कार मिलता है l जिस माँ की गोद मे हम पले बढ़े है उस देश व राष्ट्र के प्रति भी जिम्मेदारी का निर्वहन आवश्यक है l जन्म देने वाली माँ के साथ साथ भारतमाता के प्रति भी कर्तव्यों का पालन करना है l पहले बच्चो को महापुरुषों की कथा कहानी सुनाकर सुलाया जाता था आज माताएं टीबी मोबाइल देखते हुए बच्चो को सुलाती है खुद भी सोती है l यह प्रकिया हमे संस्कृति से दूर कर रही है l महापुरुषों के विचारो से हम दूर होते चले गए यह हमारे भटकने का कारण है l मनुष्य व पशुओं के बच्चों का भेद बताते हुये कहा कि पक्षियों की माँ बच्चो को दाना लाती है पंख आने पर वे उड़कर दूर चले जाते है आज यही स्थिति बच्चो के साथ हो रही है इसलिए शिक्षा के साथ संस्कार देना अति आवश्यक है l पूत सपूत तो क्यो धन संचय पूत कपूत तो क्यो धन संचय का सार बताया कि अनावश्यक धन संग्रह की वजह से बच्चो को संस्कार नही दे पाते l पित्रो के लिए दान को भी निर्रथक बताया l मुक्ति के नाम पर दान दिया गया उस आत्मा को हासिल नही हो सकता l
कोरोना ने रोकी फिजूल खर्ची
कोरोना महामारी की वजह से शादियों व फिजूलखर्ची पर रोक लगी l अंतिम संस्कार के नाम पर भोज बन्द हुआ l जब व्यक्ति विवश होता है तब वह किसी भी कुरीतियों को आसानी से दूर कर लेता है l
