रायगढ़। विगत 16 जून से स्कूलों के कपाट खुल चुके हैं, लेकिन अब तक सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था पटरी पर नहीं आ सकी है। घरघोड़ा के ग्रामीण अंचल के स्कूलों की हालत बहुत ही चिंताजनक है। अभी तक ना तो स्कूल समय पर खुल रहे हैं और ना ही शिक्षक समय पर पहुंच रहे हैं।
बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़
कुछ गांवों के ग्रामीणों ने हमें बदहाल शिक्षा व्यवस्था की जानकारी दी तो हमारी टीम ने ब्लॉक के कई स्कूलों का दौरा कर सच्चाई जानने का प्रयास किया। ग्राउंड लेवल पर हमारी पड़ताल में सामने आया कि वाकई इस आदिवासी बहुल विकासखंड में शैक्षणिक व्यवस्था की स्थिति अत्यंत खराब है। हमने देखा कि कुछ स्कूलों में शिक्षक नदारद हैं, कुछ स्कूलों के बच्चे बाहर खेल रहे हैं, तो कुछ स्कूल समय पर खुले ही नहीं हैं। घरघोड़ा के सर्वाधिक पिछड़े भाग माने जाने वाले दूरस्थ कया कमतरा क्षेत्र की स्थिति और भी दयनीय मिली। यहां के स्कूलों में बाकायदा एक आंतरिक व्यवस्था बनाई गई है, जिसके तहत यदि किसी स्कूल में 2 शिक्षक पदस्थ हैं तो दोनों अलग-अलग दिन स्कूल आते हैं। यानी प्रत्येक दिन केवल एक ही टीचर के भरोसे स्कूल चलता है और दूसरा शिक्षक घर पर आराम फरमाता है। ऐसे स्कूलों में शिक्षकों के आकस्मिक अवकाश के कोरे आवेदन हमेशा एक-दूसरे के पास उपलब्ध रहते हैं, जो किसी उच्चाधिकारी के औचक निरीक्षण पर पहुंच जाने की स्थिति में तुरंत दिन-तिथि भरकर अनुपस्थित शिक्षक को उस दिन अवकाश पर होना बता दिया जाता है। एक अच्छी बात यह भी है कि कई स्कूल ऐसे मिले जिनके शिक्षक पूरी ईमानदारी से अध्यापन करते पाए गए। इन स्कूलों और अन्य स्कूलों में फर्क साफ देखा जा सकता है।
महीनों से नदारद शिक्षकों पर अधिकारी की मेहरबानी
हमारी टीम ने पूरे घरघोड़ा ब्लाक का दौरा किया। इस दरम्यान कई चौंकाने वाली जानकारियां हमारे सामने आई। इनमें से सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह लगी कि कई शिक्षक महीनों से स्कूल नहीं आए हैं, लेकिन बाकायदा हर महीने उनके खाते में सैलरी जमा हो रही है। ऐसे कुछ केस आपके सामने हैं:-
केस-1- मिडिल स्कूल कुर्मीभौंना यहां के बच्चों और ग्रामीणों ने बताया कि यहां पदस्थ शिक्षक साथराम राठिया कभी-कभार ही स्कूल आते हैं। जब कभी आते हैं तो पढ़ाते ही नहीं हैं, क्योंकि उनकी स्थिति पढ़ाने लायक ही नहीं होती। यहां यह सिलसिला कई वर्षों से चला आ रहा है, बगैर ड्यूटी के उक्त शिक्षक को प्रतिमाह हजारों रुपए की तनख्वाह मुफ्त में दी जा रही है।
केस-2- मिडिल स्कूल बरौनाकुंडा इस स्कूल की स्थिति भी ऐसी ही है। यह स्कूल केवल एक शिक्षिका के भरोसे ही चल रहा है, क्योंकि दूसरा पदस्थ शिक्षक सौकी लाल माझी 16 जून के पहले से ही अब्सेंट है। बच्चों ने बताया कि माझी सर साल में केवल दो तीन बार ही विद्यालय आते हैं।
केस-3- मिडिल स्कूल भालुमार स्कूल की शिक्षा समिति के पदाधिकारी बताते हैं कि यहां कुल 4 शिक्षक पदस्थ हैं, जिनमें से एक शिक्षक अगले महीने रिटायर होने वाले हैं, दूसरे शिक्षक को सीएसई बना दिया गया है, तो तीसरी शिक्षक सुमन अग्निहोत्री पिछले 8 महीनों से गायब है। ऐसे में अगले महीने से ये बड़ा स्कूल एक शिक्षक के भरोसे ही चलेगा। वे बताते हैं कि अग्निहोत्री मैडम की अनुपस्थिति की शिकायत कई बार विभाग को दे चुके हैं लेकिन आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है।
केस-4-प्राइमरी स्कूल बरभांठा स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि यहां पदस्थ शिक्षक संजय सिंह के खिलाफ ग्राम वासियों ने कई बार लिखित शिकायत दी है लेकिन आज तक कोई कार्यवाही नहीं की गई। ये लगातार अनुपस्थित रहते हैं, जब कभी विद्यालय आते हैं तो हमेशा शराब के नशे में होते हैं।
केस-5-प्राइमरी स्कूल तिलाईपाली यहां कुल 2 शिक्षक पदस्थ है। इनमें से एक को रायगढ़ में आरटीओ की एजेंटी करने से ही फुर्सत नहीं है, तो दूसरा शिक्षक केवल हाजिरी भरने के लिए स्कूल आता है। अच्छी बात यह है कि यहां की शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी गांव के दो पढ़े लिखे युवाओं ने सम्हाल रखी है।
केस-6- प्राइमरी स्कूल पियईदरहा यह स्कूल भी केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहा है। क्योंकि दूसरी पदस्थ शिक्षिका के भी यही हाल हैं। वह रायगढ़ में रहती है और हफ्ते में केवल एक दो बार ही स्कूल आती है। स्थानीय ग्रामीणों ने इसकी शिकायत की थी और समाचार पत्रों में भी यहां की समस्या को उठाया गया था। लेकिन अभी तक उक्त शिक्षिका पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है।
यह तो कुछ ही उदाहरण हैं, ऐसे लगभग दो दर्जन से ज्यादा स्कूल हैं जो अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। जाहिर सी बात है कि उच्चाधिकारियों के संरक्षण बिना मैदानी कर्मचारियों में इतनी हिम्मत कहां से आएगी? यहां तो सबको खुली छूट मिली हुई है। ऐसे में घरघोड़ा में अब तक के सबसे लंबे वक्त तक बीईओ के प्रभार में रहने का रिकार्ड कायम करने वाले ब्लॉक शिक्षा अधिकारी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाजमी है।
रायगढ़ जिले के नवपदस्थ कलेक्टर श्रीमती रानू साहू ने अपने पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद जिले में शिक्षा और स्वास्थ्य को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में गिनाया था। अब यह देखना बाकी है कि इस पिछड़े क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए वे क्या कदम उठाती हैं ?
