शहरों में सूखते नल: संरचना में बदलाव समय की मांग; तभी रोजगार सृजन में तेजी के साथ आय और विकास को बढ़ावा मिलेगा

by Kakajee News

इंटरनेट के युग में बड़े-बड़े दावे कुछ ही घंटों में खत्म हो जाते हैं। पिछले हफ्ते केरल के उद्योग एवं विधि मंत्री पी. राजीव ने पानी की कमी से जूझ रही बंगलूरू की आईटी कंपनियों को केरल आने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि ‘केरल में छोटी-बड़ी 44 नदियां हैं और यहां पानी की कोई समस्या नहीं है।’ लेकिन यह जुमला ज्यादा देर तक नहीं चल सका, क्योंकि आपूर्ति और मांग के बीच के अंतर की वास्तविकता जल्द सामने आ गई। मंत्री के दावों के तीन दिनों के भीतर ही ‘कोच्चि में बंगलूरू जैसे दिन’ की खबरें सुर्खियां बनीं और तिरुवनंतपुरम के लोगों ने नलों के सूखने की शिकायत की।

 

देश का शायद ही कोई ऐसा शहर हो, जहां लोगों को पानी की कमी और टैंकर माफिया के अत्याचार का सामना न करना पड़ता हो। आप गूगल पर पानी की कटौती वाले शहरों और टैंकर से जलापूर्ति करने वालों का पता लगा सकते हैं। लखनऊ में भूजल स्तर गिरने के कारण 49 इलाकों में पुराने कुओं को पुनर्जीवित किया जा रहा है। वाराणसी में जल संरक्षण और जल निकायों को संरक्षित करने के लिए घर-घर ‘जल तीर्थ’ नामक अभियान चलाया जा रहा है। विश्व जल दिवस पर अमर उजाला ने ‘गंगा किनारे, प्यासी काशी’ शीर्षक से खबर प्रकाशित की, जिसमें गिरते भूजल स्तर के बारे में बताया गया था। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली या पर्यटन केंद्र जयपुर की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है।

मुंबई के लोगों ने घोषित और अघोषित जल कटौती को सामान्य मान लिया है। स्टार्ट-अप के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरते पुणे में बीस मंजिल से ज्यादा ऊंचे टावर बन रहे हैं, जबकि मौजूदा कॉलोनियां जल संकट से जूझ रही हैं। थाणे-रायगढ़-पनवेल इलाके में गृह स्वामियों को एक घंटे की जलापूर्ति से काम चलाना होगा और टैंकर का प्रदूषित पानी लेना होगा। ऐसे में, क्या पानी की गारंटी के लिए रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम में संशोधन करने की आवश्यकता है?

याद रखिए, ये शहर भारत के विकास की कहानी को ताकत प्रदान कर रहे हैं। राजनीतिक रूप से, 543 लोकसभा सीटों में से 100 सीटें शहरी प्रकृति की हैं, फिर भी जल संकट राजनीतिक चर्चा या मौजूदा चुनाव प्रचार में कोई मुद्दा नहीं है। अपनी पुस्तक एक्सीडेंटल इंडिया में मैंने बताया है कि पानी एक मौन संकट है, जिसे समाधान की प्रतीक्षा है। नीति आयोग ने 2018 की अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ’21 प्रमुख शहरों में भूजल स्तर शून्य के करीब पहुंचने वाला है, जिससे 10 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित होंगे।’ मेरी दूसरी पुस्तक, द गेटेड रिपब्लिक में संकट की सीमा, सार्वजनिक विफलताओं व निजी समाधानों और सरकारी प्रावधान से हटकर भुगतान सेवाओं की ओर स्थानांतरण का वर्णन किया गया है। विडंबना यह है कि अब भुगतान करके सुविधाएं हासिल करने वाला समुदाय भी पीड़ित है।

ऐसे संकट के दृश्य सभी शहरों में दिख रहे हैं। अधिकांश शहरों में सुबह-सुबह पानी के टैंकर आवासीय इलाकों में पहुंचते हैं। मुंबई में वी.एस. मार्ग पर टैंकर आपूर्तिकर्ता आरओ-उपचारित या फिल्टर किए गए पानी की पेशकश करते देखे जा सकते हैं। शहरी बस्तियों में बोतलबंद पानी कंपनियों ने इस मौके का लाभ उठाया है।

सच यह है कि भारत में शहरीकरण अनियोजित ढंग से हुआ है। भारत का हर शहर ग्रामीण इलाकों में स्थित जलाशयों पर निर्भर है, जो अक्सर 50 से 100 किलोमीटर के बीच होता है। बंगलूरू मृत जलाशय और सौ किलोमीटर दूर कावेरी नदी से पानी प्राप्त करता है। चेन्नई चोलावरम और वीरन्नम झील से पानी लेता है। दिल्ली भूजल और सोनिया विहार जल उपचार संयंत्र पर निर्भर है, जो गंगा और यमुना का पानी लेता है। मुंबई 150 किलोमीटर दूर ऊपरी वैतरणा सहित सात झीलों पर निर्भर है।

खराब उपलब्धता और अव्यवस्थित प्रबंधन के कारण जल संकट बना हुआ है। भारत के पास वैश्विक आबादी का लगभग 16 प्रतिशत और जल संसाधनों का चार प्रतिशत है। भारत की जनसंख्या चीन जितनी ही बड़ी है, लेकिन विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, मीठे जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता भारत में चीन से आधी है। भारत में सालाना 3,880 अरब घन मीटर वर्षा होती है, लेकिन यह मुश्किल से 1,999 अरब घन मीटर का ही लाभ उठा पाता है। देश में करीब 249 अरब घन मीटर भूजल का दोहन किया जाता है, मगर उसमें से 89 फीसदी का उपयोग खेती में ही होता है।

साफ है कि नीति निर्माताओं को उपलब्धता और प्रबंधन की खामियों पर ध्यान देना चाहिए। अध्ययन या समाधान की कोई कमी नहीं है। खाद्य उत्पादन के उपयोग की दक्षता में सुधार लाने पर प्राथमिक रूप से जोर देना जरूरी है। ‘प्रति बूंद ज्यादा फसल’ की थीम से परे फिर से फसल मानचित्र तैयार करने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, पानी की कमी वाले क्षेत्रों में धान या गन्ने की खेती को बंद करना होगा। इससे खेती में पानी के असंतुलित और अत्यधिक उपयोग से निजात मिलेगी।

पानी के उपयोग को फिर से आकार देने और रीसाइक्लिंग करने की भी आवश्यकता है। दो वैश्विक उदाहरण ध्यान देने योग्य हैं। वर्ष 2019 में सिंगापुर ने 2030 तक अपने 70 फीसदी पानी को रीसाइकिल करने का लक्ष्य रखा था। यह द्वीपीय देश प्रतिदिन लगभग 90 लाख गैलन पानी की बचत का भी लक्ष्य बना रहा है। बेशक, सिंगापुर एक छोटा देश है, लेकिन पानी की रीसाइक्लिंग के इसके प्रयास शहरी भारत के लिए आदर्श हो सकते हैं। दूसरा मामला इस्राइल का है, जो पानी की कमी वाले भौगोलिक क्षेत्र में है। यहां की 70 फीसदी से ज्यादा फसलों की ड्रिप सिंचाई होती है। पानी को लवण से मुक्त करने वाले इसके संयंत्र सालाना 70 करोड़ घन मीटर पानी का उत्पादन करते हैं, जिसमें से करीब 20 करोड़ घन मीटर पानी यह जॉर्डन को निर्यात करता है।

इस्राइल ने 2030 तक सालाना 1.2 अरब घन मीटर पानी को लवण मुक्त करने का लक्ष्य रखा है। भारत में अभी पानी को लवण मुक्त करने वाले चार संयंत्र हैं, 7,500 किलोमीटर से अधिक लंबी तटरेखा के साथ भारत भी इस समाधान का लाभ उठा सकता है। सच है कि उपलब्धता में सुधार और प्रबंधन में बदलाव के लिए नए घटकों और संसाधनों की आवश्यकता होती है। पर यह भी उतना ही सच है कि 100 खरब डॉलर की जीडीपी की आकांक्षा को बनाए रखने के लिए इन संरचनात्मक परिवर्तनों की आवश्यकता है। और इसमें निवेश से रोजगार सृजन, आय और विकास को बढ़ावा मिलेगा।

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