आधुनिक युग में अंधविश्वास के चलते हो रहा बाघ का शिकार

by Kakajee News

देश में बाघों की घटती संख्या चिंताजनक है। केंद्रीय और राज्य स्तर पर बाघों के संरक्षण एवं संवर्धन की योजनाओं पर लगातार काम चल रहा है। टाइगर रिजर्व क्षेत्रों का विस्तार किया जा रहा है लेकिन अपेक्षित सफलता अब भी कोसों दूर है। इस दिशा में ईमानदार कोशिश की दरकार है। बस्तर में बाघ की खाल लेकर घूम रहे पांच पुलिसकर्मियों सहित आठ लोगों की गिरफ्तारी सरकारी कर्मचारियों की मानसिकता बयां करने को काफी है। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि जिन पुलिसकर्मियों के कंधों पर सुरक्षा और जिन शिक्षकों पर भावी पीढ़ी को जागरूक करने का अहम् दायित्व है, वही वन्यप्राणियों के शत्रु बन गए हैं।
हालांकि, आरोपितों को वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की विभिन्न धाराओं की तरह गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है, लेकिन शासन के जनसेवकों का इस तरह का कृत्य राज्य के साथ देश के लिए भी घातक है। तांत्रिक अनुष्ठान के नाम पर गिनती के बचे वन्यप्राणियों का शिकार करना गंभीर प्रकृति का अपराध है। इसकी पुनरावृत्ति न हो इसके लिए कठोर दंड सुनिश्चित किया जाना जरूरी है। शुरुआती तौर पर बताया जा रहा है कि सूअर पकड़ने के लिए लगाए गए जाल में बाघ फंसकर मर गया। ग्रामीणों ने भय के कारण यह बात छुपा ली। यह कहानी सही है तो भी आरोपितों के प्रति रहम की जरूरत नहीं है। गिरफ्तार किए गए तीन ग्रामीणों से ही इस मामले में लिप्त दो अन्य पुलिसकर्मियों और शिक्षकों को जानकारी मिली। इनसे पूछताछ के दौरान जो सच्चाई सामने आई है, वह बड़ी चौंकाने वाली है। उन्होंने बताया है कि तांत्रिक अनुष्ठान करने के लिए बाघ की खाल का उपयोग करने की तैयारी थी। आधुनिक युग में पढ़े-लिखे और सभ्य समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों द्वारा अंधविश्वास के चलते वन्यप्राणियों का शिकार करना और उसमें सहभागी बनना हमारे जागरूक होने पर सवालिया निशान लगा रहा है। यह विडंबना ही है कि जिन पर समाज को सुधारने की जिम्मेदारी है। जिन पर समाज को सही दिशा देने की जिम्मेदारी है। जिन पर अपराध को खत्म करने और अंकुश लगाने की जिम्मेदारी है, वही राह भूल चुके हैं। बाघों की संख्या में आने वाली इस गिरावट के पीछे शिकार ही एकमात्र कारण नहीं है। जंगलों का लगातार और तेजी से हो रहा विनाश भी इसकी प्रमुख वजह है। मनुष्य अधिक धन कमाने लिए जंगलों का लगातार दोहन कर रहा है। इससे वन ही नहीं, वन्यप्राणियों के विनाश का रास्ता भी खोल दिया है। निरंतर बढ़ती आबादी और तेजी से हो रहे शहरीकरण की वजह से जंगल का स्थान कांक्रीट के मकान लेते जा रहे हैं। जंगल में अतिक्रमण कर रह रहे लोगों ने वन्यप्राणियों के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। ऐसे में वन्यप्राणी आखिर जाएं तो कहां? निश्चित रूप से यह बड़ी चिंता का विषय है। सृष्टि में ईश्वर ने सभी के लिए न्यायपूर्ण व्यवस्था की है। इंसान के ये कृत्य ईश्वरीय व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं, जिसे रोकने की जिम्मेदारी हम सब की है।

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