वामपंथियों की पिछलग्गू बनकर रह गयी है कांग्रेस

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यह अलग बात है कि भारत द्वारा अपनायी गयी संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था के कारण मजबूरी व रणनीतिक घुसपैठ की नीति के तहत वामपंथीगण चुनाव प्रक्रिया में भाग लेते हैं अन्यथा वामपंथियों की इस लोकतंत्र पर आस्था कभी नहीं रही है। वे ‘सर्वहारा की तानाशाही’ का नारा देकर ‘एक दलीय राज व्यवस्था’ के पैरोकार रहे हैं। वे लोकतंत्र की संस्थाओं जैसे संसद, न्यायपालिका, नौकरशाही आदि को पूंजीवादी व्यवस्था की रक्षक मानकर इसके विरुद्ध क्रांति ही नहीं वरन सशस्त्र क्रांति तक की बात करते हैं।

भारत में कांग्रेस आजकल विचारधारा ही नहीं वरन कार्यक्रमों व एक्शन के मामले में भी वामपंथियों की पिछलग्गू बनकर रह गयी है। यही कारण है कि देश में वर्षों की मेहनत से स्थापित लोकतांत्रिक परम्पराओं के लिये न्यूनतम सम्मान भी उनमें नहीं दिख रहा है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के पास हुजूम लेकर ज्ञापन सौंपने का आईडिया इसकी ही बानगी है।

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Author: kakajee

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