जेनेरिक दवाओं से केमिस्ट को फायदा, मरीजों को नहीं

by Kakajee News

रायपुर । सीजीखबर डेस्क: रसायन एवं उर्वरक संबंधी संसद की स्थायी समिति ने देश में दवाओं की कीमतों को लेकर एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाला खुलासा किया है. संसद में पेश अपनी नवीनतम रिपोर्ट में समिति ने स्पष्ट किया है कि दूर-दराज़ और ग्रामीण इलाकों में सप्लाई होने वाली ‘ट्रेड जेनेरिक’ दवाओं के नाम पर भारी मुनाफाखोरी की जा रही है. इसका सीधा असर आम नागरिकों और गरीब मरीजों की जेब पर पड़ रहा है, जिन्हें सस्ती दवा का लाभ मिलने के बजाय कई गुना अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है.

यह मामला तब सामने आया जब समिति ने दवाओं की विनिर्माण/थोक कीमत (PTS/PTR – Price to Retailer/Stockist) और उनके डिब्बे पर छपी अधिकतम खुदरा बिक्री कीमत (MRP) के बीच के भारी अंतर की समीक्षा की. रिपोर्ट में समिति ने कुछ प्रमुख दवाओं के उदाहरण देकर इस बड़े खेल को उजागर किया है:

1) Ceflox-TZ 1100 और CIP-TZ टैबलेट: जिस कीमत पर यह दवा थोक बाजार से खुदरा विक्रेता या केमिस्ट को मिलती है (PTS), वह महज 450 रुपये है. लेकिन मरीजों को बेचने के लिए इसकी MRP 3,500 रुपये तय की गई है. यानी केमिस्ट और मध्यस्थों के लिए इस पर सीधे 3,050 रुपये का मार्जिन है, जो कि लगभग 678 फीसदी का भारी-भरकम फायदा दर्शाता है.

2) Ibuflam टैबलेट: इस दवा की PTS कीमत 831 रुपये है, जबकि बाजार में इसकी MRP 4,560 रुपये रखी गई है. इसमें 3,729 रुपये का अंतर है, जिससे केमिस्टों को करीब 448 फीसदी का मुनाफा मिल रहा है.

3) Labocof DMR टैबलेट: यह दवा केमिस्ट को मात्र 316 रुपये में उपलब्ध होती है, लेकिन मरीज इसे 2,850 रुपये में खरीदने को मजबूर हैं. इस दवा पर 2,534 रुपये यानी करीब 801 फीसदी तक का मार्जिन वसूला जा रहा है.

इन आंकड़ों से साफ है कि ‘ट्रेड जेनेरिक’ श्रेणी की दवाओं पर केमिस्टों और डिस्ट्रीब्यूटरों को 400 प्रतिशत से लेकर 800 प्रतिशत तक का मुनाफा हो रहा है.

संसदीय समिति के समक्ष जब यह मुद्दा आया, तो फार्मास्युटिकल्स विभाग (DoP) ने तर्क दिया कि ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में दवाएं पहुंचाने में परिवहन (लॉजिस्टिक्स) का खर्च ज्यादा आता है. साथ ही, वहां दवाओं के बिकने की रफ्तार धीमी होती है, जिससे स्टॉक के एक्सपायर होने का जोखिम और रखरखाव का खर्च बढ़ जाता है, इसलिए कीमतों में यह अंतर दिखाई देता है.

हालांकि, सांसद कीर्ति आजाद झा की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने सरकार के इस तर्क को पूरी तरह से खारिज कर दिया. समिति ने कहा कि यह काफी दुखद और हैरान करने वाला है कि विभाग अनैतिक व्यापारिक प्रथाओं और अनुचित मुनाफे पर लगाम लगाने के बजाय उसे जायज ठहराने की कोशिश कर रहा है.

समिति ने टिप्पणी की कि जिन ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की क्रय शक्ति (खरीदने की क्षमता) पहले से ही कम है, उनसे इस तरह अतिरिक्त लागत के नाम पर इतनी ज्यादा कीमत वसूलना अनुचित है.

संसदीय समिति ने सरकार और फार्मास्युटिकल्स विभाग को कड़े निर्देश देते हुए सिफारिश की है कि इस मामले में तुरंत ठोस कदम उठाए जाएं. समिति ने मांग की है कि ‘ट्रेड जेनेरिक’ दवाओं की कीमतों और केमिस्टों के प्रॉफिट मार्जिन को नियंत्रित (कैप) करने के लिए सख्त नियम बनाए जाएं, ताकि ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों के मरीजों को वाजिब और किफायती दामों पर दवाइयां मुहैया कराई जा सकें.

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