संपादक नरेश शर्मा की रिपोर्ट
रायगढ़. छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले सहित सहित सरगुजा, जशपुर व कोरबा के अलावा ओडिशा के कुछ क्षेत्रों में बीते कई सालों से जंगली हाथियों का आतंक लगातार जारी है और इन हाथियों के आंतक को रोकने के लिए वन विभाग ने अभी तक कोईं ठोस योजना नही बनाई है जिसके चलते रायगढ़ जशपुर कोरबा और सरगुजा जिले में हर सप्ताह जंगली हाथियों के हमले से कम से कम एक व्यक्ति की मौत हो रही है और वहीं इन हाथियों के आतंक से बचने के लिए हाथियों के अवैध शिकार की घटनाएं भी बढ़ी है। आज विश्व हाथी दिवस है और इस मामले में वन विभाग द्वारा केवल कागजों में हाथियों से बचने के साथ साथ प्रभावित इलाकों में केवल समझाईश के कार्यक्रम रखने के बाद फिर से हाथी प्रभावित क्षेत्रों में वहां के लोगों को अपने हाल पर छोड़ दिया है।

विश्व हाथी दिवस पर अगर आंकड़ो पर गौर करें तो अब तक एक दर्जन से भी अधिक जंगली हाथियों के शिकार हो चुके है और बीते पांच सालों में इससे दोगुनी संख्या में हाथी के हमले से मौते भी हो चुकी है। साथ ही साथ प्रभावित इलाकों में किसानों द्वारा लगाई गई फसलों के नुकसान भी एक चुनौती बन चुके हैं।

बावजूद इसके सरकार इस मामले में न तो गंभीरता बरत रही है और न ही हाथी प्रभावित क्षेत्रों के लिए कोई बड़ी पहल कर रही है। इतना ही नही रायगढ़ जिले में तो एक के बाद एक औद्योगिक विस्तार से बचे खुचे जंगल और जमीनों के कम होनें के चलते हाथियों का रूख गांव की तरफ हो जाता है। जिसको रोकने के लिए आज भी फटाखे तथा मशालांे का उपयोग करने उन्हें खदेडने पर पहल होती है। मौके पर न तो कभी वन मंडलाधिकारी पहुंचते हैं और न ही क्षेत्र के नेता।

हाथी प्रभावित क्षेत्रों में वहां के ग्रामीण सीधे जंगली हाथियों से जूझने को मजबूर है और इसीलिए दोनों के बीच बढ़ते तनाव से असमय जनहानि और जंगली हाथियों के शिकार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इनके आंकड़ो पर अगर गौर करें तो 2020 के 4 माह में 11 हाथियों की मौत हुई थी और 2021 में अगस्त माह तक 6 हाथियों की मौत हो चुकी है।



ऐसा नही है हाथी प्रभावित क्षेत्र में जान बूझकर वहां के रहवासी या किसान जंगली हाथी का शिकार करते हैं। बल्कि वे उनके आतंक से बचने के लिए कभी खेतों के किनारे फसल को बचाने करंट प्रवाहित तार छोड़ते हैं या फिर जंगलों में वन विभाग द्वारा ट्रांसमिशन लाइन की चपेट में आने से उनकी मौते होती है।

अलग अलग दल में विचरण करने वाले जंगली हाथियों से बिछडने वाले दंतैल हाथी ग्रामीणों को अपना शिकार बनाते हैं। इन घटनाओं को रोकने के लिए राज्य सरकार के पास कोई प्लानिंग नही है। पुरानी रणनीति के तहत क्षेत्र के वन मंडलाधिकारी योजना बनाते हैं जो पूरी तरह विफल होती है। एक जानकारी के अनुसार रायगढ़ वन मंडल व धरमजयगढ़ वन मंडल में बीते दस सालों से हाथियों की बढ़ती संख्या लगातार सिरदर्द बन रही है। लेकिन इस पर नियंत्रण पाने के लिए योजनाएं फाईलों में कैद हो गई है।

काका जी डॉट के संपादक ने इस संबंध में रायगढ़ वन मंडलाधिकारी प्रणय मिश्रा और धरमजयगढ़ वनमंडलाधिकारी एसमणी से बात करने की कई कोशिश की और इनमें से रायगढ वन मंडलाधिकारी प्रणय मिश्रा का मोबाईल नंबर 7587012600 हमेशा की तरह बंद मिला और धरमजयगढ़ वनमंडलाधिकारी एसमणी हिंदी नही समझते। इससे लगता है कि दोनों मंडलाधिकारी जंगली हाथियों के बढ़ते प्रभाव और उनके हमलों से हो रही मौतों को रोकने के साथ साथ जंगली हाथियों के अवैध शिकार के लिए कितने गंभीर है।
गांव में रतजगा करके करते है सुरक्षा
रायगढ़ व धरमजयगढ़ वन मंडल के हाथी प्रभावित इलाकों में जंगली हाथियों के दस्तक से ही गांव के बुजुर्ग, महिलाएं बच्चों को जंगली हाथियों से बचाने पीएम आवास की छत, हाईस्कूल भवन, आंगनबाड़ी की शरण लेते है। जबकि गांव के युवा रात जागरण कर जंगली हाथियों की निगरानी में लगे रहते है। इन क्षेत्रों में जंगली हाथियों का आंतक इस कदर है कि शाम ढलते ही इस वनांचल क्षेत्र के अधिकांश गांव में सन्नाटा पसर जाता है। स्थिति यह है कि इनमें से एक भी ग्रामीण अगर जंगल की तरफ छूट जाता है तो वह जिंदा वापस नही लौटता।
बीमार पड़ने लगे ग्रामीण
बरसात के दिनों में जंगली हाथियों से जान माल की रखवानी करने रतजगा करने वाले ग्रामीण अब धीरे धीरे बारिश में भीग कर बीमार पड़ने लगे हैं। कोरोना के इस दौर में ग्रामीण बारिश में भीगकर सर्दी ,खांसी, बुखार से पीड़ित होकर जान बचाने संघर्ष कर रहे हैं। पूरी रात अपने गांव की रक्षा करने वाले ग्रामीण अपनी ही सुविधा के अनुसार बारी बारी से टीम बनाते हैं और इस रतजगा के चलते उनकी तबियत भी बिगड़ जाती है। लेकिन वन विभाग इन ग्रामीणों के लिए कोई पहल नही करता।
खानापूर्ति तक सिमित रह गया वन विभाग
वनांचल क्षेत्र धरमजयगढ़ में जंगली हाथियों का सर्वाधिक आतंक जारी है। जंगली हाथियों के ग्रामीण इलाकों में पहुंचने की जानकारी तत्काल ग्रामीणों द्वारा वन विभाग को दी जाती है। परंतु वन विभाग जंगली हाथियों से ग्रामीणों के बचाव में पूरी तरह फेल हो चुका है। जंगली हाथियों की मौजूदगी के वक्त वन कर्मचारी मौके पर रहते जरूर हैं लेकिन बारिश, धुंध के बीच जंगली हाथियों से ग्रामीणों के खून पसीने की कमाई से तिनका..तिनका जोड़ कर बनाए गए घरों एवं फसलों को बचा पाने में नाकाम साबित हुआ है। ग्रामीणों को भारी भरकम नुकसान होनें के बाद मुआवाजे के रूप में मरहम की तर्ज पर चंद रूपए ही मिल पाता है। कई बार तो किसानों की महीनों की मेहनत से लगाई गई धान व सब्जी आदि की फसल हाथी रौंद देते हैं और उनके बदले में उन्हें मुआवजे के रूप में एक रूपए से लेकर हजार रूपए तक प्रदान किये जाते हैं।
प्रभावित ग्रामीणों की मांग पर नही लगती मुहर
हाथी प्रभावित ग्रामीणों के द्वारा एक लंबे अर्से से शासन से अपने उजड़े हुए आशियाने के बदले प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्के मकान बना कर दिए जाने की मांग करते करते थक चुके हैं। साथ ही पूरे रिहायशी इलो में कंटीले तार से बेरिकेट्स करने की मांग के अलावा हर घर में टार्च वितरण करने के साथ साथ स्थिति सामान्य होनें तक निः शुल्क राशन वितरण करने की मांग की जाती रही है। बीते साल कुछ हाथी प्रभावित क्षेत्र में जंगल के किनारे करंट प्रवाहित फेंसिंग लगाई गई थी लेकिन रख रखाव के अभाव में यह फेंसिंग अब गायब हो चुकी है। वन विभाग के अधिकारी ऐसे मामलों में चुप्पी साध लेते हैं। जिससे बढ़ते जंगली हाथियों की संख्या ग्रामीणों के लिए लगातार काल बनते जा रहे हैं।
अब तक दो सौ से अधिक घर तोड़े
छत्तीसगढ़ के रायगढ़, जशपुर, कोरबा के साथ साथ अंबिकापुर जिले के अंतर्गत आने वाले मैनपाट क्षेत्र में पिछले सात महीनांे से जंगली हाथी जमे हुए है। इन जंगली हाथियों ने इस क्षेत्र के दो सौ से अधिक मकानों को क्षति पहुंचाया है। सर्वाधिक मुश्किल में मेनपाट के लगे ग्राम डांडकेसरा के गांव वाले है। यहां फिर से हाथियों ने धावा बोलना शुरू कर दिया है। लगातार बारिश के बीच शाम ढलते ही हाथियों की चिंघाड़ से डांडकेसरा के लोग सिहर उठते है। यही हाल धरमजयगढ़ वन मंडला के दर्जनों गांव का है और यहां से लगे कोरबा जिले के भी आधा दर्जन गांव जंगली हाथियों के आंतक से जूझ रहे हैं।
आंखों की रोशनी बहुत कम
हाथी की आंखों की रोशनी बहुत कम होती है।इससे भी ज्यातदा दिलचस्प ये है कि हाथियों को तेज रोशनी में कम दिखाई देता है और कम रोशनी में ज्यादा। हाथी की आंखों की पुतलियां बहुत जल्दी सूख जाती हैं। पुतलियों को आसानी से हिलाने के लिए हाथी की आंखों में एक तरल पदार्थ की सप्लाई होती रहती है जो ज्यादा होने पर आंखों से बाहर निकल आता है।
सबसे फिट जानवर
हाथी का वजन भले ही 5,000 किलोग्राम से ज्याआदा हो मगर वजन के बाद भी ये सबसे चुस्त जानवर होता है।हाथी आमतौर पर छह किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चलते हैं।हाथी पूरे दिन में करीब 10 से 20 किलोमीटर तक चलता है और सिर्फ तीन से चार घंटे सोते हैं, वो भी लेटकर नहीं बल्कि खड़े होकर।
इसलिए चींटी और मच्छर से लगता है डर
यह सुनने में भले ही आपको अजीब लगे, लेकिन हाथी चींटी और मक्खियों से डरता है और इसी कारण वह अपनी सूंड फूंक-फूंक कर आगे कदम बढ़ाता है। हाथी की चमड़ी लगभग एक इंच तक मोटी होती है लेकिन त्वचा बहुत संवेदनशील होती है और अगर हाथी को चींटी, मच्छर या मक्खी काट ले, तो इससे उसकी त्वचा पर गहरा घाव हो जाते हैं।
8 लीटर पानी पी जाता है हाथी
हाथी की सूड़ में करीब 150,000 मांसपेशियां होती हैं। हाथी की सूड़ उनके शरीर का सबसे संवेदनशील अंग है। एशियाई हाथी सूड़ से मूंगफली को उठाकर, उसे छील कर और फिर उसे खा सकता है। हाथी अपनी सूड़ का प्रयोग पानी पीने में करते हैं और एक बार में ये 8 लीटर तक पानी पी सकते हैं। जिस समय हाथी तैरते हैं उस समय सूड़ का प्रयोग सांस लेने में करते हैं।
इतना खाना खाता है हाथी
हाथी पूरे दिन खाना खाता है और एक दिन में उसे 150 किलोग्राम से ज्याहदा खाने की जरूरत होती है। हालांकि, इसमें से बस आधा ही खाना वो पचा पाता है मगर वो इतना खाते हैं कि उनके दिन का एक तिहाई हिस्साि बस खाना खाने में ही जाता है।
एक घंटे में चलने लगता है हाथी का बच्चा
हाथी का बच्चा दिखने में सबसे प्योरा लगता है मगर ये सबसे ज्यािदा शक्तिशाली होता है। हाथी का बच्चा पैदा होने के बस 20 मिनट के अंदर ही अपने पैर पर खड़ा हो जाता है और एक घंटे के अंदर चलने लगता है। दो दिन के बाद वो झुंड के साथ चलने लगता है और अपने खाना-पानी की तलाश भी करने लगता है।
इसलिए दिनभर कान हिलाता है हाथी
हाथी को बहुत गर्मी लगती है और अपने विशालकाय शरीर से गर्मी को बाहर निकालने के लिए अपने कानों का प्रयोग करते हैं। इसलिए ही अक्सरर आपने उन्हेंक अपने कानों को हिलाते हुए देखा होगा।कहा तो यहां तक जाता है कि गर्मी की वजह से ही अफ्रीकी हाथियों के कान बड़े होते हैं।हालांकि इस तथ्यज को किसी भी वैज्ञानिक अध्यीयन में साबित नहीं किया जा सका है।
