बिलासपुर। सरगुजा जिले के मैनपाट वन परिक्षेत्र में मकानों को क्षतिग्रस्त करने, फसलों को नुकसान पहुंचाने के बाद लखनपुर वन परिक्षेत्र के ग्राम पंचायत लब्जी में घुसे नौ हाथियों का व्यवहार उग्र हो गया है।तीन दिनों में हाथियों ने लब्जी पंचायत के लोटढोढ़ी बस्ती में दस पहाड़ी कोरवाओं के मकान क्षतिग्रस्त कर दिए है।कड़ाके की ठंड में बेघरबार हुए पहाड़ी कोरवा परिवार के सदस्यों को क्षेत्र में हाथियों की मौजूदगी के कारण पहाड़ी से नीचे बस्ती में शिफ्ट तो कर दिया गया है, लेकिन हाथियों के चले जाने के बाद उतपन्न होने वाली समस्याओं को लेकर कोरवा परिवार के सदस्य चिंतित है। वन विभाग की ओर से क्षति का आंकलन किया गया है, लेकिन मुआवजा वितरण की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई है।
मूलतः ओडिशा के हाथियों का एक दल पिछले कई वर्षों से मैनपाट में प्रवेश करता रहा है। पिछली बार इस दल में हाथियों की संख्या चौदह थी। जून के महीने में ही हाथियों ने मैनपाट इलाके को छोड़ा था। उसके बाद हाथी जशपुर और रायगढ़ वन मंडल की ओर बढ़ गए थे। इस दौरान दल के सदस्यों की संख्या कम हो गई। दिसंबर के शुरू में ही हाथियों ने मैनपाट में वापसी कर ली। इस बार दल में हाथियों की संख्या नौ है। दल में सदस्यों की संख्या कम होने से हाथियों का व्यवहार पूरी तरीके से बदला हुआ है। मैनपाट वन परिक्षेत्र में हाथियों ने सात ग्रामीणों का घर क्षतिग्रस्त करने के साथ घर में रखा अनाज भी खा लिया था। हाथियों ने खेतों में खड़ी फसल को भी नुकसान पहुंचाया था।
हाथियों का यह दल मैनपाट और कापू वन परिक्षेत्र के सीमावर्ती जंगल में कुछ दिनों तक विचरण किया और अभी लखनपुर वन परिक्षेत्र में प्रवेश कर गए हैं। लखनपुर और मैनपाट का जंगल भी आपस में मिला हुआ है। हाथियों ने लखनपुर वन परिक्षेत्र के ग्राम पंचायत लब्जी के आश्रित ग्राम लोटाढोढ़ी को अपना निशाना बनाया है। इस बस्ती के नजदीक जंगल में हाथी जमे हुए हैं। पिछले तीन दिनों में हाथियों ने यहां दस पहाड़ी कोरवा ओं के घरों को तहस-नहस कर दिया है।टूटे आशियाने में रहना खतरनाक हो सकता है। इसलिए वन विभाग ने सभी पहाड़ी कोरवा को पहाड़ी के नीचे जामा बस्ती में शिफ्ट कर दिया है। यहां स्कूल और आंगनबाड़ी भवन में सभी पहाड़ी कोरवाओं को रखा गया है जिन पहाड़ी कोरवा ओं के घर सुरक्षित है उन्हें भी पहाड़ के ऊपर जाने नहीं दिया जा रहा है। वन विभाग का एकमात्र उद्देश्य जनहानि को रोकना है।
हाथियों से बचाव के लिए अभी तक कोई उपाय नहीं किया गया है।जिला मुख्यालय अंबिकापुर में बैठे वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी प्रभावित क्षेत्र का दौरा भी नहीं किए हैं और ना ही प्रभावित परिवारों से उन्होंने मुलाकात ही की है। वन विभाग के मैदानी कर्मचारियों को हाथियों से बचाव के काम में लगाया गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि दिन के समय वन कर्मचारी क्षेत्र में नजर आते हैं, लेकिन शाम को जब हाथियों का उत्पात चरम पर होता है तब वन कर्मचारी कहीं नजर नहीं आते हैं। संसाधनों के नाम पर ग्रामीणों को कुछ भी उपलब्ध नहीं कराया गया है। हाथियों से जान माल की सुरक्षा के लिए शासन स्तर से वन विभाग को गजराज वाहन भी उपलब्ध कराया गया है, लेकिन लखनपुर क्षेत्र के हाथी प्रभावित इलाके में अभी तक इसकी उपयोगिता सुनिश्चित नहीं की गई है। लखनपुर जनपद उपाध्यक्ष अमित सिंह देव ने प्रभावित परिवारों के बीच पहुंचकर उनकी समस्या सुनी है और अपने स्तर से टॉर्च और गर्म कपड़े उपलब्ध कराएं हैं लेकिन पहाड़ी कोरवाओं के समक्ष सबसे बड़ी दिक्कत हाथियों के चले जाने के बाद नए सिरे से आशियाने को तैयार करने की है।
ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों द्वारा पहुंचाए जाने वाले नुकसान के एवज में मुआवजा बेहद कम दिया जाता है। ऐसे में क्षतिग्रस्त मकानों को नए सिरे से खड़ा कर पाना संभव नहीं है। हाथी अभी भी लोटाढोढ़ी बस्ती से नजदीक जंगल में ही जमे हुए हैं। शुक्रवार की रात भी हाथियों का दल जंगल से बाहर निकला था। हाथियों ने दोबारा उन्हीं घरों को निशाना बनाया जिसको वे पहले तोड़ चुके थे। दूसरी बार हाथियों के हमले से प्रभावित परिवारों के घर पूरी तरह से तबाह हो चुके हैं।घर में रखे सामान और अनाज भी खराब हो चुके हैं।लखनपुर वन परिक्षेत्र अधिकारी सूर्यकांत सोनी का कहना है कि लोटाढोढ़ी बस्ती में 20 से 25 परिवार निवास करते थे इसमें से 10 घरों को हाथियों ने तबाह कर दिया है। सभी लोगों को सुरक्षित तरीके से नीचे ले आया गया है। उन्हें मैदानी क्षेत्र में रोक कर रखा गया है। पहाड़ पर जाने की इजाजत अभी नहीं दी जा रही है। उन्होंने बताया कि वन विभाग की ओर से ज्यादा से ज्यादा राहत देने की कोशिश की जा रही है। आवास और भोजन को लेकर किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं है। प्रयास किया जा रहा है कि जिन ग्रामीणों का मकान पूरी तरीके से नष्ट हो गया है उनके लिए नया मकान तैयार किया जाए इसके लिए विभाग के उच्चाधिकारियों से भी चर्चा की जा रही है।
पूर्व के वर्षों में हाथी प्रभावित क्षेत्रों में वन विभाग के बड़े अधिकारियों की नजर रहती थी।ऐसी किसी घटना पर वे तत्काल मौके पर पहुंचते थे। आला अधिकारियों को अपने बीच पाकर प्रभावित परिवार के लोग भी समस्या बता दिया करते थे, लेकिन अब यह व्यवस्था भी लगभग समाप्त हो चुकी है। न तो प्रशासन और न ही वन विभाग का कोई अधिकारी प्रभावित परिवारों के बीच पहुंच रहा है। कड़ाके की ठंड में बेघर हुए लोग चिंतित हैं।
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