उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के सेमरहवा गांव की आबादी आजादी के सात दशक बाद भी आवागमन की दुश्वारियां झेल रही है। शादी के बाद दिल में लाख अरमान संजोए पिया के घर पहुंचने वाली इस गांव की दुल्हनों को बांस का पुल पार कर पैदल ही जाना होता है। बरसात के मौसम में चार महीने तक लोग जान जोखिम में डालकर आते-जाते हैं। लेकिन रोहिन नदी पर एक अदद पुल यहां के लोगों को नसीब नहीं हो पाया।
जिले के लक्ष्मीपुर ब्लॉक के सेमरहवा गांव की दो हजार की आबादी तक विकास की किरणें नहीं पहुंच सकी हैं। विकास की इन किरणों को नेपाल से निकलने वाली रोहिन नदी रोक लेती है। सेमहरवा गांव के सामने नदी पर पुल ही नहीं है। गांव के लोगों ने जुगाड़ कर नदी पर बांस-बल्ली का कामचलाऊ पुल बनाया है। गर्मियों में जंगल के हिंसक पशुओं से किसी तरह खुद व फसलों को बचाने वाले लोगों को बरसात के चार महीने भारी कष्ट झेलना पड़ता है। नदी में पानी भरने के कारण जर्जर बांस-बल्ली के कामचलाऊ पुल पर चलना जोखिमभरा हो जाता है। मजबूरी में लोग जान जोखिम में डालते हैं। गांव के लोगों की पीड़ा है कि चुनावों के समय पुल बनवाने का वादा किया जाता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही वादा याद नहीं रहता।
चार टोलों में जंगल से सटा है यह गांव
चार टोलेवाला सेमरहवा गांव जंगल के समीप बसा है। बाढ़ के समय हर वक्त हादसे की आशंका रहती है। पुल न रहने के कारण ही यह गांव अति पिछड़े गांवों में शुमार है। नदी व जंगल से घिरे इस गांव के लोगों की तकलीफें तब और बढ़ जाती हैं, जब ब्याह कर पहली बार ससुराल आने वाली दुल्हन को भी पैदल बांस का पुल पार करना पड़ता है।
रणनीति बनाकर आंदोलन होगा
भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष सुरेश चंद्र साहनी कहते हैं कि आजादी से लेकर अब तक सेमरहवा गांव की सुधि किसी ने नहीं ली। इसके लिए अब रणनीति बनाकर आंदोलन किया जाएगा। पुल की मांग को लेकर जन समर्थन जुटाया जाएगा।
