कोरोना की क्रूरता : छह लोगों के परिवार में रह रहे बुजुर्ग की लावारिस की तरह अंत्येष्टि, नाना का चेहरा तक न देखा..बस दस्तखत किए और चले गए

by Kakajee News

जिस जिस लाडली को पिता ने बड़े अरमानों से पाला, खुशियों की डोली में आंसुओं के साथ विदा किया। आज उसी बेटी ने रिश्तों को शर्मसार कर बुजर्ग पिता की ऐसी अंतिम विदाई की, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। पिता कोरोना वायरस का शिकार हुआ हुआ, मानो कोई अपराध कर दिया हो। बेटी तो क्या, नातियों की संवेनहीनता भी ऐसी रही कि शव देखना तक गंवारा नहीं समझा। छह लोगों वाले भरे-पूरे परिवार में पुलिस पहुंची तो न आने के लिए एक के बाद एक बहाने शुरू कर दिए। काफी प्रयास के बाद भी जब कुछ न हुआ तो लावारिसों की तरह अंतिम संस्कार कराया गया।
यह दर्दनाक वाक्या कानपुर के विजय नगर इलाके का है। यहां रहने वाले 80 वर्षीय बुजुर्ग कुछ दिन पहले संक्रमित हो गए थे। बेटी और उसके बच्चों ने प्राइवेट अस्पताल में लाकर भर्ती तो करा दिया पर पता और मोबाइल नंबर गलत लिखवा दिया। इलाज के दौरान वृद्ध की मौत हो गई तो पता चला कि परिजन तो पहले ही चले गए। जांच रिपोर्ट पर नंबर सही था, उसी आधार पर शव निस्तारण टीम ने घरवालों से संपर्क किया। इस पर बेटी और उसके नवासों ने कहा कि वह अस्पताल नहीं आ पाएंगे। अभी कर्फ्यू लगा है, लाश आप लोग ही जलवा दें अब देखना ही क्या है। टीम ने नियमों का हवाला दिया पर सभी आने से मना करते रहे। डॉक्टरों ने कहा कि वारिस होते हुए लावारिस कैसे ले जा सकते हैं। इस दौरान पुलिस को भी सूचना दी गई। घर पहुंचकर पुलिस ने डपटा तो एक परिजन ने कहा, रुक जाइए खाना खाकर आ रहे हैं। वह किसी तरह अस्पताल तो पहुंच गया पर कागज पर दस्तखत बनाकर निकल गया।

बुजुर्गों के साथ सर्वाधिक परेशानी
अस्पतालों में कोविड संक्रमितों बुजुर्गों के शवों को लेकर सबसे अधिक परेशानी है। इनके अंतिम संस्कार के लिए घर के एक-दो सदस्य ही आ पाते हैं। हालत यह है कि कभी-कभी औपचारिकताएं पूरी करने को सिर्फ महिलाओं को ही भेज दिया जाता है। कोविड शव निस्तारण टीम में लगे एक योद्धा का कहना है कि लोग यह भी नहीं पूछते हैं कि शव निस्तारण हो गया या नहीं।
शव निस्तारण टीम के नोडल अधिकारी डॉ. नवनीत चौधरी ने बताया कोरोना रिश्तों का ताना-बाना तोड़ रहा है। विजय नगर निवासी बुजुर्ग के घर वालों को कोविड अस्पताल बुलाने में घंटों इंतजार करना पड़ा। पुलिस की मदद लेनी पड़ी मगर लोग अस्पताल से वापस चले गए, घाट नहीं गए।

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