जीएम फसलों को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। बीटी कपास हो या बीटी ब्रिंजल इन दोनों को लेकर ही बवाल खड़ा हुआ। अब सरकारी बायोटेक रेग्युलेटर जेनेटिक इंजिनीयरिंग अप्रेजल कमिटी (GEAC) ने सरसों के जेनेटिकली मोडिफाइड बीजों का इस्तेमाल करने की मंजूरी दे दी है। अभी कमर्शियल खेती में ही इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा।
जीईएसी के तहत जीएम सरसों पर बनी एक्सपर्ट कमिटी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति दीपक पेंटल को वैज्ञानिक शोध को स्वीकार कर लिया। इंडियन काउंसिल ऑफ ऐग्रिकल्चरल रिसर्च (CAR) ने परागण पर अध्ययन की रिपोर्ट जारी होने के बाद इन बीजों को मंजूरी दी है। जीएम सरसों को मंजूरी मिलने का मतलब है कि यह फसल पर्यावरण कि दृष्टि से सही रहेगी। हालांकि अभी केंद्रीय कैबिनेट ने इसकी मंजूरी नहीं दी है।
साल 2009 में यूपीए सरकार में पर्यावरण मंत्री रहे जयराम रमेश ने भारत में पहले जीएम फूड बीटी बैंगन को मंजूरी दी थी। वहीं अब भारत को खाने के तेल के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के मकसद से जीएम सरसों को मंजूरी दी गई है। इससे उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है। मामले से जुड़े लोगों ने कहा कि अगर सरकार कोई आपत्ति नहीं करती है तो जीएम सरसों अब एक स्वीकार्य फसल है।
बता दें कि पहले भी जीएम सरसों को लेकर बहस उठी थी। नेशनल अकैडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइँसेज ने कहा था कि बीटी कपास का अनुभव कहता है कि जेनेटिकली मोडिफाइड फसलों का प्रयोग असफल रहा है। बीटी कपास की फसल साल 2006 तक तेजी से बोई गई लेकिन इसके बाद इसका उत्पादन तेजी से गिरने लगा। इससे किसानों को नुकसान होने लगा।
सरसों की जिस किस्म को मंजूरी दी गई है उसका नाम डीएमएच -11 है। इसे वरुण नाम की पारंपरिक सरसों की प्रजाति और यूरोप की एक प्रजाति के साथ क्रॉस करके बनाया गया है। दावा किया गया है कि इससे सरसों के उत्पादन में 30 फीसदी तक वृद्धि हो जाएगी। बता दें कि जीएम फसल वे होती हैं जो कि वैज्ञानिक तरीके से रूपांतरित करके तैयार की जाती हैं।
