महिलाएं कपड़े सिलाई कर हो रहीं आर्थिक रूप से सक्षम, उनके उत्पाद को मिल रहा बाजार, 10 लाख टर्न ओवर का प्लान, जिंदल फाउंडेशन के आकृति सिलाई सेंटर में बेसिक से लेकर एडवांस कोर्स का दिया जा रहा प्रशिक्षण

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रायगढ़ । जांे महिलाएं कभी घर के चैेका बर्तन करने तक सीमित थीं ऐसी महिलाओं को आजीविका से जोड़कर आत्मनिर्भर व आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के उद्देश्य से जिंदल फाउंडेशन तमनार के आकृति सिलाई केंद्र द्वारा कपड़ा सिलाई करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यहां महिलाओं को बेसिक से लेकर एडवांस कोर्स तक कराए जा रहे हैं ताकि वे सिलाई की हर विधा में पारंगत हो सकें। अगले वित्तीय वर्ष के लिए 10 लाख रूपए वार्षिक टर्न ओवर का प्लान बनाया गया है ताकि महिलाओं को अधिक फायदा हो सके।
सरकार द्वारा गांवों की महिलाओं को स्व सहायता समूह से जोड़ कर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त करने का प्रयास किया जा रहा है। इस कड़ी में जिंदल फाउंडेशन तमनार द्वारा विशेष कार्य किया जा रहा है। तमनार में जिंदल फाउंडेशन द्वारा महिला आकृति सिलाई सेंटर संचालित किया जा रहा है। इस सेंटर में क्षेत्र की महिलाएं बड़ी संख्या में जुड़ी हुई हैं। इस कार्य से इन महिलाओं को प्रति माह करीब आठ से दस हजार रूपए की आय हो रही है। इस सेंटर को लोकल तथा रायगढ़ के दुकानों से यूनिफार्म सिलाई करने के लिए प्रति वर्ष आॅर्डर मिलता है । स्कूल यूनिफाॅर्म के अलावा ये महिलाएं जैकेट आदि भी बनातीं हैं। महिलाओं को दो चरणों में प्रशिक्षण दिया जाता है, पहले उन्हें बेसिक कोर्स में काज, बटाना, तुरपाई आदि सिखाया जाता है, इसके बाद उन्हें एडवांस कोर्स कराया जाता है, जिनका काम बेहतर होता है उन्हें प्रोडक्शन से जोड़ा जाता है। इसके बाद उनकी आय शुरू हो जाती है। अभी तक इस सेंटर से एक हजार से अधिक महिलाओं को बेसिक और एडवांस कोर्स कराया जा चुका है। इनमें से अधिकांश महिलाएं अपने अपने घरों में स्व रोजगार चला रहीं हैं।
त्यौहारी सीजन में आय हो जाती है डेढ़ गुनी
आकृति सेंटर और मार्ट की इंचार्ज सुजाता प्रधान ने बताया कि फिलहाल इस सेंटर से 53 महिलाएं जुड़ी हुई हैं। इन महिलाओं को लाभांश भी दिया जाता है, महिलाएं अपने समय के हिसाब से सेंटर आती हैं और काम करतीं हैं। उन्होंने बताया कि नवरात्रि, शादी के समय और दीवाली जैसे उत्सवों के समय में महिलाओं की कमाई डेढ़ गुना तक बढ़ जाती है। ऐसे सीजन में एक- एक महिला कम से कम 15 से 20 हजार तक प्रति माह कमा लेतीं हैं। नए सदस्य भी बनाए जाते हैं।
खास बात महिलाएं पुरूषों के कपड़े सीती हैं
अमूमन महिलाओं को ब्लाउज, लहंगा, चोली यानी महिलाओं के कपड़े सीने का काम कराया जाता है, लेकिन आकृति प्रशिक्षण केंद्र में उन्हें पुरूषों के भी कपड़े पेंट, शर्ट, कोट, जैकेट बनाने का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। यहां कटिंग से लेकर स्टीचिंग तक सिखाया जाता है ताकि वे कहीं भी काम कर सकें। इस केंद्र में जिन्हें प्रशिक्षित कर काम कराया जा रहा है, उन्हें ट्रेनर भी बनाया जाता है, ताकि वे खुद भी आॅर्डर लेकर काम कर सकें।
सी मार्ट की तर्ज पर एसएचजी मार्ट भी ताकि उत्पाद को मिल सके बाजार
क्षे़त्र के स्व सहायता समूह की महिलाओं द्वारा बनाए जा रहे सामानों को बाजार नहीं मिल रहा था, जिसके कारण वे आय नहीं कर पा रहीें थीं। महिलाओं की इस समस्या को देखते हुए जिंदल फाउंडेशन द्वारा समूह के उत्पाद को बाजार उपलब्ध कराने के लिए तहसील के पास एक सी मार्ट की तर्ज पर एसएचजी मार्ट भी खोला गया है, यहां क्षेत्र भर के करीब 25-30 समूह की महिलाओं े द्वारा बनाए गए सामानों की बिक्री की जा रही है,, इससे उन्हें बाजार मिल रहा है। इस मार्ट में समूहों द्वारा बनाए गए मिलेट के खाद्य पदार्थ, संबलपुरी साड़ी, संबलपुरी कपड़े, सलवार, यूनिफार्म, बांस से बनाए गए सामान, फिनाइल, बड़ी, पापड़, आचार आदि उपलब्ध हैं।

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Author: kakajee

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