हिन्दी को राजभाषा का दर्जा मिले तकरीबन सत्तर वर्ष से ऊपर हो चुके हैं। अमृत महोत्सव का दौर चल रहा है। अभी हमने स्वतंत्रता दिवस बड़े धूमधाम से मनाया। जाहिर सी बात है गणतंत्र दिवस भी उसी तर्ज पर मनाया जायेगा लेकिन एक फर्क स्पष्ट रुप से दिखा कि इस बार हर घर तिरंगा अभियान को अनूठी सफलता मिली। 30 करोड़ झंडे का बिकना और 500 करोड़ रु. का व्यापार यह जतलाता है की तिरंगे को लेकर हमारे भीतर जो एक मंद सी ज्वाला थी वह लौ बन चुकी है।
हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी के पाँच प्रण को जिसमें दूसरा और तीसरा गुलामी के एहसास से मुक्ति और विरासत पर गर्व, बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन अर्थो मे अब भाषाई गुलामी जो अब तक हम पर हावी थी उससे मुक्त होने का अवसर आ चुका है। अंग्रेजी सुन कर सिकुडऩे की बजाय चौड़े होकर हिन्दी मे जवाब देने का वक्त। यहां अंग्रेजी का विरोध कतई नहीं है। वह भी एक समृद्ध भाषा है और उसका ज्ञान होना अच्छी बात है लेकिन उसे लेकर एक दास्यभाव हमारे मन मस्तिष्क मे मौजूद है उसे उतार फेंकना बेहद जरूरी है। अंग्रेजी के चकाचौंध आकर्षण से बचना बेहद कठिन है पर फिफ्टी नाईन और और उनसठ के बीच के फर्क को भी आपका बच्चा जाने यह उससे जादा जरूरी है। आज भी देश के नब्बे फीसदी बच्चे अपनी मातृभाषा मे ही शिक्षा ग्रहण करते हैं। अहिन्दी भाषी राज्यों में मातृभाषा के अलावे यदि हिन्दी भाषा पर भी जोर दिया जाये तो वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी राष्ट्रभाषा का स्वरूप ले सकती है।
हमारे देश के दिग्गजों ने भी इस दिशा मे कोई अथक प्रयास नहीं किया। यदि किया भी तो वह इतनी क्लिष्ट थी कि जुबान पर चढ़ ही ना सकी। यह महज एक भ्रम है कि अंग्रेजी विश्व मे लोकप्रिय है। हकीकत यह है कि एशिया के अड़तालीस देशों मे भारत को छोड़़ कर अंग्रेजी किसी भी देश की मुख्य भाषा नहीं है और यदि योरोप की बात करें तो 43 देशों मे 40 देशों की भाषा अंग्रेजी नहीं है। कारण स्पष्ट है कि उन देशों के पास उनकी अपनी भाषा थी जिसे उन्होंने विकसित और समृद्ध किया। भाषा तो हमारी भी समृद्ध थी पर अंग्रेजी के आतंक के चलते हमने उसे हाशिये पर डाल दिया। उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रता के पश्चात भी हमारी प्रतियोगी परिक्षाएं भी इसी भाषा मे होती रहीं। वह तो 1979 मे गैरकांग्रेसी (जनता दल) सरकार ने इसमें बदलाव लाकर हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं मे कर देशज भाषाओं का सम्मान बढ़ाया। भाषाएं सभी सम्माननीय होती हैं उन्हें किस रूप मे प्रस्तुत किया जा रहा है यह विचारणीय है।
अंग्रेजी भाषा एक शासक की भाषा के तौर पर हमारे देश मे रही और उसका लक्ष्य हमे शासित करते रहने के अलावा और कुछ नहीं था। आज हम विश्व गुरु बनने की राह पर हैं तो क्या भाषायी दरिद्रता के चलते अंग्रेजी की बैसाखी थामनी होगी? भोपाल के भाषाविद् डा.आर.एस तोमर के अनुसार 1400 ई. मे मैथ्यू और आस्कट द्वारा अंग्रेजी का पहला शब्दकोश मात्र 10000 शब्दों से संपादित किया गया जो आज बढ़कर सात लाख हो चुकी है। हिन्दी का पहला शब्दकोश 1829 मे पादरी आदम द्वारा संकलित हुआ। आज उसमें मात्र दो लाख शब्द हैं। शब्दों की संख्या यदि बढ़ नहीं रही तो अपनी भाषा की उपेक्षा और विदेशी भाषा का मोह भी एक मुद्दा है। देश को स्वतंत्र हुए पचहतर वर्ष होने जा रहे हैं लेकिन भाषायी मायनों मे आज भी हमारी गुलाम मानसिकता कायम है जबकि भाषा किसी भी देश की संस्कृति की आत्मा होती है। इन अर्थो मे अंग्रेजी ने हमारी संस्कृति को भी बहुत नुकसान पहुंचाया है और पहुंचा भी रही है। अंत मे इस बार शिक्षक दिवस पर बहुत सी बातें सोशल मीडिया पर आई पर जो दिल को छू गई उसे साझा कर रही हूँ।
कई उच्चकोटि की अमेरिकन कम्पनियों के सीईओ भारतीय मूल के ही क्यों हैं? क्यों भारतीयों को ही सुगमता से नौकर बनाया जाता है? कभी भारतीयों ने विचार किया। रशिया, जर्मनी, चीन, कोरिया, फ्रांस, जापान इन देशों को अमरीका अपना गुलाम नहीं बना पाता और ना ही उनके टेलेन्ट को चुरा पाता है… कभी इसका कारण सोचा है?
वो इसलिए क्योंकि इन देशो में उनकी मातृभाषा है… जिसके कारण उन देशो के लोग अंग्रेजी में शिक्षा नहीं लेते, उन्हें अंग्रेजी में विज्ञान, गणित, इंजीनियरिंग, कला नहीं आती… इसके कारण कोई भी दूसरा देश उनके लोगों को नौकर बना कर नही ले जा पाता..
भारत ने अंग्रेजी अपना ली (जबरदस्ती डाली गई 1856 से)। और इसी कारण 140 करोड़ भारतीय गर्व करते हैं की वह नौकर हैं अंग्रेज देशो के, (अमरीका, आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, न्यूजीलेंड)। यदि यही भारत अंग्रेजी ठुकरा देता और कोई चार-पाँच भाषाएं अपना लेता (पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर भारत के चार विभाग कर) तो आज विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होता… कोई इसका गणित, विज्ञान भी नही चुरा पाता क्योंकि पहले अनुवाद करना पड़ता। आज भारत विश्व का सबसे बड़ा नौकर देश है। अंग्रेजी बोलने वाले नौकरों का देश… पापा, आईबीएम में नौकरी मिल गई, आई एम् प्राउड ऑफ़ यू, बेटा। अंग्रेजी देशो के लिए नौकर तैयार करने वाली दुकान…
शिक्षक दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं।
तो क्या अब घर-घर तिरंगा की तरह घर-घर हिन्दी की जरूरत है?
