छत्तीसगढ़ में 2025 में सिर्फ दो हिरणों का शिकार: सच या आंकड़ों का खेल?

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रायपुर । छत्तीसगढ़ वन विभाग मुख्यालय में शिकार की जानकारी के लिए दो प्रकार के डाटाबेस होते हैं। पहला, खुद विभाग का एंटी पोचिंग डेटाबेस और दूसरा वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो का डेटाबेस।

क्या कहते हैं डाटाबेस: 2025 में शिकार एवं अवैध तस्करी की सिर्फ 23 घटनाएं।

छत्तीसगढ़ वन विभाग के एंटी पोचिंग डाटाबेस के अनुसार वर्ष 2025 में सिर्फ दो हिरणों का शिकार हुआ, जबकि हिरणों के शिकार के समाचार आए दिन प्रकाशित होते रहते हैं। अभी हाल ही में सुर्खियों में आया कि एक सरकारी रिसॉर्ट में हिरण का मांस पकाया जा रहा था। 2025 के आंकड़ों के हिसाब से अन्य जानवरों में जंगली सूअर चार, तेंदुआ पांच, बाघ एक, पैंगोलिन तीन, भालू तीन, कछुआ एक, बाइसन दो, नीलगाय एक, नेवला एक—कुल 23 शिकार एवं अवैध तस्करी की घटनाएं हुईं।

2024 में सिर्फ 13 शिकार एवं अवैध तस्करी की घटनाएं।

2023 में भी दो हिरणों का शिकार हुआ। 2024 के आंकड़ों के हिसाब से अन्य जानवरों में जंगली सूअर तीन, तेंदुआ पांच, बाघ एक, कछुआ एक, मैना एक—कुल 13 शिकार एवं अवैध तस्करी की घटनाएं हुईं।

क्या कहते हैं वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो के आंकड़े:

दिल्ली स्थित वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो, वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत निर्मित एक निकाय है, जिसमें देश के सभी वन मंडल शिकार की जानकारी होने पर अपलोड करते हैं। परंतु छत्तीसगढ़ के वन मंडल वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो में आंकड़े ही अपलोड नहीं करते। छत्तीसगढ़ वन विभाग ने लिखित रूप से बताया है कि 2024 में उनके किसी भी वन मंडल ने वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो डेटाबेस में डाटा एंट्री नहीं की। 2025 की जानकारी मांगने पर बताया गया कि वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो की वेबसाइट काम नहीं कर रही है।
जानकारी देते हुए रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने बताया कि यह अत्यंत गंभीर विषय है कि प्रदेश में निरंतर एवं निर्बाध रूप से वन्यजीवों का शिकार जारी है, परंतु विभागीय विफलताओं को छुपाने के उद्देश्य से इन घटनाओं का समुचित रिकॉर्ड संधारित नहीं किया जा रहा है। जानबूझकर मुख्यालय स्तर पर आंकड़ों का संकलन नहीं किया जाता, ताकि एकीकृत जानकारी सार्वजनिक न हो सके और वास्तविक स्थिति सामने न आए। यदि आंकड़ों को नियमित रूप से अपडेट किया जाए तो शिकार की वास्तविक संख्या कहीं अधिक उजागर होगी, जिससे विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े होंगे। इस प्रकार डेटा का अपूर्ण संधारण वन्यजीव संरक्षण के दायित्वों की अनदेखी भी दर्शाता है। अधूरे आंकड़े देखकर मुख्यालय के अधिकारी खुश होते हैं कि शिकार की घटनाएं कम हो रही हैं और शिकार रोकने के लिए कड़े कदम नहीं उठाते। सिंघवी ने कहा कि वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो के डाटाबेस में एंट्री इसलिए नहीं करते, क्योंकि क्योंकि यदि सभी शिकार के आंकड़े अपलोड कर दिए जाएं तो राष्ट्रीय स्तर पर विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं। वन विभाग को चाहिए कि वह शिकार से संबंधित वास्तविक आंकड़े बिना किसी छुपाव के जनता के सामने रखे।

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Author: kakajee

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