सौदान सिंह की छत्तीसगढ़ से विदाई पर.. “भीतर ही भीतर”..क्यों खुश हैं..कई भाजपा कार्यकर्ता..?

by Kakajee News

पूरे 15 साल तक छत्तीसगढ़ में भाजपा के दाई-ददा बने रहे सौदान सिंह, नेताओं के नजदीक और कार्यकर्ताओं से हमेशा दूर रहे

(शशि कोन्हेर द्वारा)

बिलासपुर। भारतीय जनता पार्टी के संगठन का जैसा स्वरूप है..उसमें आम कार्यकर्ता को छत्तीसगढ़ प्रभारी अथवा राष्ट्रीय महामंत्री जैसे पद पर बैठे महानुभावों से कोई बहुत अधिक लेना-देना नहीं रहता। भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता की उन तक पहुंच केवल दर्शन मात्र भर की रहती है। मतलब आम कार्यकर्ता उन्हें केवल देख सकता है। उनसे बात या संवाद कतई नहीं कर सकता। इसी तरह भाजपा का प्रदेश प्रभारी किसे बनाया जाता है..? उस पद से किसे हटाकर कहां किया जाता है..? इन सब बातों को पार्टी के आम कार्यकर्ता कोई तवज्जो नहीं देते। उन्हें इनसे कोई लेना-देना भी नहीं रहता। लेकिन इन सब से परे, छत्तीसगढ़ में भाजपा की कमान लगातार डेढ़ दशक तक संभाले रखने वाले प्रदेश प्रभारी सौदान सिंह के हटने से पता नहीं क्यों..भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग न केवल मन ही मन खुश दिख रहा है,वरन आपस में, भीतर ही भीतर अपनी खुशी भी, जाहिर कर रहा है। उसे ऐसा लगता है कि श्रीमान सौदान सिंह के जाने से, अब छत्तीसगढ़ की भारतीय जनता पार्टी में वह सब बदलाव हो सकेगा। जो इसके लिए अपरिहार्य बन गया है। और जिसे “ना” करने के कारण ही, बीते चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक दुर्गति हुई है। लगातार 15 साल तक प्रदेश में, भाजपा के दाई- ददा बने रहे सौदान सिंह ने शायद , पार्टी के लिए कठोर और पथरीली होती जा रही जमीनी (सच्चाई) धरातल पर कभी गौर तक नहीं किया। भाजपा और संघ में संगठन मंत्रियों का सबसे बड़ा काम परिवार के मुखिया की भूमिका निर्वहन करने का होता है। उनका स्नेह आमतौर पर ऐसे कार्यकर्ता और नेताओं को अधिक मिलता रहा है जो मलाईदार वर्ग से उपेक्षित और प्रताड़ित रहे हैं। संगठन मंत्रियों का स्नेह भरा हाथ अपनी पीठ पर पाकर भाजपा के कार्यकर्ता वो पीड़ा भूल जाते हैं। जो उन्हें उनकी अपनी पार्टी के उनके अपने बड़े लोग देते रहे हैं। लेकिन बीते 15 सालों से छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के आम कार्यकर्ता कि ना तो कदर हुई और ना ही मान सम्मान। लिहाजा सभी कार्यकर्ताओं ने अपनी आंखें बंद कर मुंह पर ताले लगा लिए। वहीं विरोधी पार्टियों के भितरघात और खुलेघात को अपनी जीत की मुख्य वजह मानने वाले छत्तीसगढ़ भाजपा के बडे मंत्री और विधायक अपनों को दुत्कार और परायों से दुलार की नीति पर चलते रहे। बीते विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की जिस तरह ऐतिहासिक और शर्मनाक पराजय हुई है। उसके कारणों की दो टूक (दूध का दूध और पानी का पानी की तरह) मीमांसा और समीक्षा करने से पता नहीं क्यों.. अभी भी पार्टी के नेता परहेज कर रहे हैं। बात तो यहां तक हो रही हैं कि छत्तीसगढ़ भाजपा में 15 सालों तक जो होना चाहिए था..पर, नहीं हुआ…और जो नहीं होना चाहिए था, वह होता रहा..! इन सबके लिए पार्टी का आम कार्यकर्ता जिन लोगों को जिम्मेदार मानता है.. दुर्भाग्य से सौदान सिंह और छत्तीसगढ़ के उनके चहेते नेताओ का नाम इनमें प्रमुखता से शुमार रहा है। छत्तीसगढ़ भाजपा के खेवनहार होने के बावजूद श्री सौदान सिंह ने पार्टी की बदतर होती जमीनी हकीकतों से खुद को और इस तरह पार्टी आलाकमान को भी दूर रखा। ऐसा नहीं है कि प्रदेश से उनकी विदाई और दूसरे प्रभारी खेवनहारों की तैनाती से छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के दिन हरे-भरे हो जाएंगे।
दरअसल भाजपा के कार्यकर्ताओं को लगता है कि पार्टी के बड़े नेताओं को अभी भी, “उसी अभिमान” ने घेर रखा है जो उनके और पार्टी के पराभव का मुख्य कारण बना था। छत्तीसगढ़ भाजपा के एक भी बड़े नेता ने अभी तक पार्टी के कार्यकर्ताओं से 15 सालों में हुई गलतियों के लिए ना तो खेद प्रकट किया है और ना ही माफी मांगी है। उल्टे ये नेता अभी भी राज्य विधानसभा के गत चुनाव में पार्टी की ऐतिहासिक हार के लिए कार्यकर्ताओं को ही अपराधी मान रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए की प्रभारी पद से सौदान सिंह के जाने के साथ ही छत्तीसगढ़ भाजपा के बड़े नेताओं का यह सोच भी विदा होना चाहिए। अन्यथा प्रदेश में भाजपा की नैया डूबने वाले राज्य के बड़े नेताओं के खिलाफ कार्यकर्ताओं का गुस्सा और बेजुबान रहने की मजबूरी, राज्य में भारतीय जनता पार्टी के संगठन को इतना अधिक निस्तेज और बेजान बनाकर रख देगी कि उससे कांग्रेस के साथ मजबूती से दो-दो हाथ करना, फिर कभी शायद ही संभव हो।

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